Short story · Romance · Rain

बरसात‑ए‑मोहब्बत

सावन की सुबह, हड़पसर बस स्टैंड, एक छाता और ३०० मीटर का सफर — मोहब्बत की पहली आहट।

बरसात — rain and umbrella scene

कहते है, मोहब्बत और मौत कभी बताकर नहीं होती, बस हो जाती है। मैं मौत का दावा तो नहीं करता, मगर हाँ, मोहब्बत जरूर हो जाती है।

वो सावन की सुबह – गीली सड़के, गरजते बादल, पत्तों पर ठहरी पानी की बूंदे और चारों तरफ़ गूंजती ये बरसात की सरगम। कुछ यूँ ही मौसम था उस दिन जब वो पहली बार मुझसे मिली थी। जब राज मार्केटिंग कंपनी में ऑफिस असोसिएट के लिए साक्षात्कार देने जा रहा था।

सुबह माँ ने घर से निकलते समय अच्छे से समझाते हुए कहा था, “आर्यन, जाते वक्त अपने साथ छाता लेते जाना, हर बार की तरह भूलना मत।” मगर मैं अपनी परंपरा के मुताबिक, घर से देरी से निकला। ऊपर से माँ से छाता लेना भी भूल गया। अब जब मैं हड़पसर बस स्टैंड पर खड़ा बारिश के रुक जाने का इंतजार कर रहा था, तब खुद को ही दोष दिए जा रहा था। आखिरकार मेरे पास अफसोस करने के अलावा कुछ और बचा ही नहीं था।

कंपनी बस स्टैंड से लगभग ३०० मीटर की दूरी पर थी, मगर मैं सफेद शर्ट खराब हो जाने के डर से वहीँ खड़ा रहा। बारिश काफी देर से रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बस स्टैंड पर एक के बाद एक बस आती, उनसे लोग उतरते और अपना छाता खोल वहाँ से चले जाते। और मैं एकटक उन्हें देखता रहता। काफी देर से खड़े रहने के कारण पैरों में भी दर्द होने लगा था। मैं सिर पर हाथ रख पीछे रखी लोहे की बेंच पर बैठ गया।

मैं सारी उम्मीद हार चूका था, तभी एक लड़की मेरे पास आई। जैसे कोई परी मुझे इस मुसीबत से निजात दिलाने के लिए ही आई हो। उसने हौले से कहा, “इक्स्क्यूझ मी सर, क्या आप बता सकते हैं ये राज मार्केटिंग कंपनी यहाँ से कितनी दूर है? दरअसल मेरा नेट काम नहीं कर रहा है तो कुछ समझ नहीं या रहा है। क्या आप मुझे बात सकते है?”

उसकी वो आवाज शहद की बूंद-सी मीठी और गुलाब की पंखुड़ियों-सी कोमल थी। मैंने हौले से अपना सिर ऊपर करते हुए उसे देखा। उसने पीले रंग का सूट पहना हुआ था। ओठों पर मुस्कान, आँखों में गहरा काजल और चेहरे पर आते घुंघराले बाल उसकी खूबसूरती पर चार चाँद लगा रहे थे। लेकिन जब उसके हाथों में पीले रंग का छाता देखा मन अंदर-ही-अंदर चहल-कदमी करने लगा।

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “बस यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर है। अगर आपको हर्ज ना हो, तो क्या मैं आपके साथ चल सकता हूँ?” ये सुन उसके चेहरे पर असमंजस के भाव उभर आए, जो कि मैं साफ उसके चेहरे पर पढ़ सकता था। मैंने उसे समझाते हुए कहा, “दरअसल मैम, मैं भी वहीँ जाना चाहता हूँ, मगर मेरे पास छाता नहीं है।”

उसने एक मुस्कान देते हुए कहा, “ठीक है।” उसका वो ‘ठीक है’ कहना ऐसा लग रहा था, जैसे किसी ने अमृत पिला दिया हो।

वो ३०० मीटर का सफर – हम दोनों बरसात में एक छाते के नीचे पानी के गड्ढों से बचते बचाते हुए चल रहे थे। मैंने इसी दौरान उससे पूछा, “आपका नाम?”

“जी, राजश्री”, उसने पूछा, “और आपका?”

“आर्यन”, मैंने जवाब दिया। ये नाम पूछने से शुरू हुआ सिलसिला कब जॉब, कॉलेज, सपनों तक पहुँचा, इल्म ही ना हुआ। बातों-बातों में सफर भी तय हो गया। राजश्री कंपनी में एच.आर. के साक्षात्कार के लिए आई थी। कंपनी के ऑफिस में हम दोनों ने पूछताछ की तो पता चला – राजश्री का साक्षात्कार पहले फ्लोर पर है और मेरा ग्राउंड फ्लोर पर। साक्षात्कार के लिए हमें काफी देर हो चूकी थी। उसने मुझे ‘ऑल द बेस्ट’ कहा और वहाँ से जाने लगी। जैसे-जैसे वो मुझसे दूर जा रही थी, मन उदास होने लगा था। मैं उसे आखरी बार देखना चाहता था, मगर लग रहा था जैसे किसी ने मुझे रोक रखा हो। मैं वहीँ खड़ा उसे देखता रहा, तभी वो एक दफा रुकी और पलटकर कहा, “इंतजार करना। वो छाता नहीं है ना तुम्हारे पास।”

बस ये सुनते ही दिल गार्डन‑गार्डन हो गया और मैंने हामी भरते हुए सिर हिला दिया।

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